Mandi: हारे उम्मीदवार अवैध कब्जों की पहचान करने में जुटे, जीते प्रतिनिधियों की बढ़ी टैंशन
punjabkesari.in Thursday, Jun 04, 2026 - 09:10 PM (IST)
धर्मपुर (उमेश): पंचायती राज चुनावों के दौरान चला शह-मात का खेल अब सरकारी दफ्तरों और कोर्ट-कचहरियों की ओर रुख करने को आतुर है। अवैध कब्जे की शिकायत की भनक लगने पर जीत चुके उम्मीदवारों को जहां बेदखली और कुर्सी गंवाने का डर सताने लगा है, वहीं हारे उम्मीदवार अपने इर्द-गिर्द शकुनियों की पहचान करने में जुट चुके हैं, ताकि उनको कब्जा नाजायज नामक चक्रव्यूह में फंसाकर जिंदगी के 10-20 साल कोर्ट-कचहरियों में भुगताए जा सकें। राजनीतिक विद्वेष की पराकाष्ठा पार कर चुके इन पंचायत चुनावों में आपसी खुन्नस वृहद आकार लेकर उन सफेदपोशों को भी बेनकाब कर सकती है, जो सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने के बावजूद सरकारी नौकरी में डटे हैं अथवा कमर्शियल ढांचे बनाकर चांदी कूट रहे हैं।
जिक्र योग्य है कि 55,673 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले हिमाचल प्रदेश का करीब 68.16 फीसदी भाग रिकॉर्डेड फोरैस्ट एरिया है लेकिन स्पॉट पर जिओ टैगिंग और डिजिटल बुर्जियां अथवा फिक्स बैंच मार्क न होने के कारण अवैध कब्जों में भारी बढ़ौतरी हुई है। अपर्याप्त जियोडेटिक कंट्रोल नैटवर्क न होने की दशा में अवैध कब्जे राजस्व और वन विभाग के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। सूबे में कई जगह हालात ऐसे हैं कि सरकारी भूमि पर शहर बस चुके हैं और आपदा की स्थिति में प्रभावित लोग प्रशासन से राहत राशि भी प्राप्त करते हैं। गांव की मिलकीयत छोड़ सरकारी भूमि कब्जाए इन प्रभावित परिवारों को जनता की गाढ़ी कमाई का हिस्सा दिया जाना राहत मैनुअल और न्यायालय दोनों की सरासर अवहेलना कहा जा सकता है।
प्रदेश उच्च न्यायालय को सौंपे आंकड़े कुल वास्तविक आंकड़ों का 20 फीसदी भी नहीं
वन और राजस्व विभागों से प्राप्त जानकारी के पश्चात जो आंकड़े प्रदेश उच्च न्यायालय को सौंपे गए हैं, असल में वे कुल वास्तविक आंकड़ों का 20 फीसदी भी नहीं हैं। जमीनी हकीकत यह है कि सूबे के ग्रामीण क्षेत्र अवैध कब्जों से सराबोर हैं और कागजों पर उकेरे हुए वन भूमि के नक्शे हकीकत से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं रखते। कइयों ने विशुद्ध जंगली किस्म के पेड़ों को काट कर इसे घासनियों में तबदील कर रखा है। वर्ष 2002 में धूमल सरकार द्वारा हिमाचल प्रदेश भूमि राजस्व अधिनियम में संशोधन कर धारा 163-ए को जोड़ा गया था, जिसके बाद सरकारी भूमि नियमितीकरण नीति के तहत मांगे गए आवेदनों की कुल संख्या 1,67,339 दर्ज की गई थी, जिससे सरकारी भूमि पर करीब 1,20,000 बीघा सरकारी जमीन कब्जाने की पुष्टि हुई थी लेकिन तत्कालीन दर्ज आंकड़ों से वर्तमान के हालात कतई मेल नहीं खाते। पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर द्वारा सार्वजनिक मंच से यह कहना कि जनादेश को प्रभावित कर जो अधिकारी पंचायत प्रतिनिधियों की जमीन नापेंगे, सरकार बनते ही उन अधिकारियों की भी जमीन नापी जाएगी। मतलब साफ है कि प्रदेश में कर्मचारी, अधिकारी और किसान सब सरकारी जमीन पर कुंडली मार कर बैठे हैं।
अवैध कब्जों पर हाईकोर्ट के कड़े तेवर, बेदखली के लिए समय सीमा निर्धारित परंतु आधिकारिक कोशिशें नाममात्र
हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम की धारा 163-ए को प्रदेश उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक और मनमाना मानते हुए इसे अनुच्छेद-14 का उल्लंघन बताया था। अब माननीय उच्च न्यायालय ने गत माह राज्य सरकार को आदेश जारी किए हैं कि 31 दिसम्बर, 2026 तक प्रदेश की वन भूमि को अवैध कब्जों से मुक्त करे। इससे पहले अनुपालना स्टेटस रिपोर्ट में प्रदेश सरकार द्वारा कोर्ट को बताया गया कि अब 5410 अवैध कब्जे बेदखल किए जाने बाकी हैं। इसके बाद कोर्ट ने संबंधित प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि शेष अतिक्रमण को वन भूमि से समयबद्ध तरीके से 31 दिसम्बर, 2026 तक हटा दिया जाए।
माननीय उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि वन भूमि पर अवैध कब्जे नियमित नहीं किए जा सकते। इसके साथ ही वन भूमि पर 5 बीघा तक अवैध भूमि को नियमित करने की नीति भी लागू नहीं होती। अनुमति के बिना गैर-वानिकी उद्देश्य के लिए वन भूमि का उपयोग नहीं किया जा सकता और कब्जा की गई वन भूमि पर यदि कोई निर्माण किया गया है तो उसका राज्य सरकार या वन विभाग द्वारा उपयोग किया जाएगा। हालांकि माननीय न्यायालय के इन आदेशों का तोड़ एफआरसी में ढूंढ कर नियमितीकरण की धड़ाधड़ अनुशंसा जारी है।

