"पहाड़ी राज्य में आर्थिक संकट को और गहरा कर दिया", CPIM का केंद्र और राज्य पर आरोप

punjabkesari.in Thursday, Jun 18, 2026 - 11:29 AM (IST)

Himachal Politics :  मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) की हिमाचल प्रदेश इकाई ने बुधवार को केंद्र और राज्य सरकार दोनों पर ऐसी नीतियां अपनाने का आरोप लगाया है, जिन्होंने इस पहाड़ी राज्य में आर्थिक संकट को और गहरा कर दिया है। पार्टी के अनुसार, इन नीतियों ने किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों को बुरी तरह प्रभावित किया है। माकपा राज्य समिति की दो दिवसीय बैठक राज्य सचिवालय के सदस्य ओंकार शाद की अध्यक्षता में शिमला में संपन्न हुई। 

बैठक में पार्टी केंद्रीय सचिवालय के सदस्य विक्रम सिंह और राज्य सचिव संजय चौहान शामिल हुए। चौहान ने राजनीतिक और संगठनात्मक रिपोर्ट पेश करते हुए राज्य में बढ़ते आर्थिक संकट का जिक्र किया। पार्टी ने इसे गंभीर आर्थिक बदहाली करार दिया है। समिति ने केंद्र के राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद किये जाने पर चिंता व्यक्त की। पार्टी का दावा है कि इससे हिमाचल प्रदेश को हर साल 7,000 से 8,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा। नेताओं ने कहा कि राज्य पर कर्ज का बोझ बढ़कर करीब 1.08 लाख करोड़ रुपये हो गया है और सरकार ऊंचे कर लगाकर विकास खर्च में कटौती कर इस बोझ को जनता पर डाल रही है।माकपा ने राजस्व घाटा अनुदान को तुरंत बहाल करने की मांग की है। उसने केंद्र और राज्य सरकार दोनों पर शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, पेयजल और बिजली सहित प्रमुख क्षेत्रों में निजीकरण को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। 

NEP 2020 लागू करने की भी आलोचना की

पार्टी ने हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 लागू करने की भी आलोचना की। उसने आरोप लगाया कि लगभग 1,500 विद्यालय या तो बंद कर दिये गये हैं या उनका विलय कर दिया गया है। उस पर से राज्य सरकार ने हाल ही में दस महाविद्यालयों को बंद करने का निर्णय भी लिया है। माकपा ने इन फैसलों को वापस लेने की मांग की है। पार्टी ने बिजली क्षेत्र के सुधारों का विरोध किया। उसने प्रीपेड स्माटर् मीटर लगाने, विद्युत अनुदान में कटौती करने और बिजली की खपत पर अतिरिक्त उपकर लगाने की आलोचना करते हुए कहा कि इन उपायों से उपभोक्ताओं पर वित्तीय बोझ काफी बढ़ गया है। पार्टी ने बढ़ते कृषि संकट पर चिंता व्यक्त की। उसने इसके लिए उर्वरकों की बढ़ती कीमतों, अनुदान में कटौती और कृषि उपज के लिए अपर्याप्त मुआवजे को जिम्मेदार ठहराया है पार्टी ने केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की 11 जून को जारी अधिसूचना को वापस लेने की मांग की। यह अधिसूचना पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति पर राशनिंग और प्रतिबंध लगाने से जुड़ी थी। पार्टी का दावा है कि इस कदम से ईंधन से चलने वाले उपकरणों पर निर्भर किसानों पर बुरा असर पड़ रहा है। समिति ने राज्य सरकार से हाल ही में हुई ओलावृष्टि और भारी बारिश से प्रभावित किसानों और बागवानों को तुरंत मुआवजा देने का भी आग्रह किया। 

'इस योजना के लिए केंद्रीय सहायता बहाल करने की मांग की'

इस आपदा से सेब, नाशपाती, आलूबुखारा, खुबानी, मटर, गेहूं और सब्जियों की फसलों को नुकसान पहुंचा है। इसके साथ ही समिति ने बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) के तहत लंबित भुगतानों को मंजूरी देने और इस योजना के लिए केंद्रीय सहायता बहाल करने की मांग की। माकपा ने डेयरी किसानों और भूमि अधिकार कार्यकर्ताओं के आंदोलनों को अपना समर्थन दिया। उसने दूध के उचित दाम, समय पर भुगतान और पूरे राज्य में दूध ठंडा करने के बुनियादी ढांचे के विस्तार को सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की मांग की। समिति ने हिमाचल प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के प्रयासों की भी निंदा की। उसने सामाजिक सछ्वाव और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक और प्रगतिशील संगठनों से एकजुट होने का आह्वान किया। 

 


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Content Editor

Swati Sharma

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