Shimla: न्यूटन के तीसरे नियम में संशोधन का दावा, पूर्व शिक्षा अधिकारी ने की प्रधानमंत्री से प्रायोगिक मदद की अपील
punjabkesari.in Monday, Jul 06, 2026 - 04:08 PM (IST)
शिमला (संतोष): शिक्षा विभाग के पूर्व सहायक निदेशक और भौतिक विज्ञानी अजय शर्मा ने सोमवार को शिमला में एक प्रैसवार्ता में दावा किया कि उन्होंने न्यूटन के 340 साल पुराने गति के तीसरे नियम का विस्तार और संशोधन किया है। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के दियोटसिद्ध क्षेत्र के निवासी अजय शर्मा पिछले 44 वर्षों से इस विषय पर स्वतंत्र रूप से शोध कर रहे हैं। उनके अनुसार न्यूटन का तीसरा नियम जो कहता है कि प्रत्येक क्रिया की एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है, केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही सही है। उनके संशोधित नियम के अनुसार, प्रतिक्रिया हमेशा क्रिया के बराबर नहीं होती, बल्कि यह क्रिया के समानुपाती होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यूटन का नियम टकराकर वापस लौटने वाली वस्तुओं के आकार (जैसे गोलाकार, शंक्वाकार, त्रिकोणीय या चपटे) को ध्यान में नहीं रखता है। उनके द्वारा प्रस्तावित इस नए संशोधन में वस्तु के आकार, बनावट और सतह की विशेषताओं के प्रभावों को भी वैज्ञानिक रूप से शामिल किया गया है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिली मान्यता
मार्च 2021 में सेवानिवृत्त हुए अजय शर्मा ने डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ में भौतिकी की पढ़ाई की है। उनके पीयर-रिव्यूड शोध पत्र इंटरनैशनल यूनियन ऑफ प्योर एंड एप्लाइड फिजिक्स (लंदन), साइंस टॉक्स एल्सेवियर (ऑक्सफोर्ड) और फिजिक्स एसेज (कनाडा) जैसी प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। 1 अगस्त 2018 को वाशिंगटन में आयोजित एक सम्मेलन में प्रस्तुति के बाद, एक अमेरिकी भौतिक विज्ञानी ने उनके काम को प्रायोगिक रूप से सिद्ध होने पर नोबेल-स्तर का योगदान बताया था।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से सहायता की अपील
प्रैसवार्ता के दौरान शर्मा ने कहा कि सेवानिवृत्त होने के कारण उनके पास प्रयोगशाला और प्रयोगात्मक सुविधाएं नहीं हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से विनम्र प्रार्थना की है कि वे देश की किसी प्रयोगशाला में इन प्रयोगों को पूरा करवाने में सहायता प्रदान करें। उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह से भी अपील की है कि वे राज्य के विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण विभाग को इस शोध परियोजना पर विचार करने का निर्देश दें। उनका अनुमान है कि हिमाचल के उपलब्ध संस्थानों में लगभग 20 लाख रुपए की लागत से 6 महीने के भीतर इन प्रयोगों को पूरा किया जा सकता है। अजय शर्मा ने जोर देते हुए कहा कि भारत केवल मौलिक शोध के माध्यम से ही विज्ञान में विश्वगुरु के रूप में उभरने की क्षमता रखता है।

