Shimla: मुकद्दमा जीतने वाला पक्ष निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर नहीं कर सकता : हाईकोर्ट

punjabkesari.in Tuesday, Oct 13, 2026 - 09:04 PM (IST)

शिमला (मनोहर): प्रदेश हाईकोर्ट ने कानून का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा है कि मुकदमे में सफल होने वाला (जीतने वाला) पक्ष निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर नहीं कर सकता, क्योंकि वह कानून की नजर में 'पीड़ित पक्ष' नहीं होता। न्यायाधीश राकेश कैंथला ने इस व्यवस्था के साथ प्रतिवादियों (पवन कुमार आदि) द्वारा दायर की गई नियमित द्वितीय अपील को 10,000 रुपए जुर्माने के साथ खारिज कर दिया।

यह कानूनी विवाद हमीरपुर जिले से जुड़ा है, जहां वादी (जनक राज) ने जमीन विनिमय के एक समझौते के आधार पर प्रतिवादियों (पवन कुमार और अन्य) के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा का सिविल मुकद्दमा दायर किया था। निचली सिविल अदालत ने 1 अक्तूबर 2004 को वादी के दावों को खारिज करते हुए उसके मुकद्दमे को पूरी तरह से डिसमिस कर दिया था, जिसका मतलब था कि फैसला प्रतिवादियों (प्रतिवादी पक्ष) के पक्ष में आया। मुकद्दमा जीतने के बावजूद प्रतिवादियों ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट), हमीरपुर की अदालत में अपील दायर कर दी।

अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए उनकी अपील खारिज कर दी कि जब निचली अदालत ने वादी का केस खारिज कर दिया है और प्रतिवादी पूरी तरह जीत चुके हैं तो वे इस फैसले से पीड़ित नहीं हैं और उनकी अपील विचारणीय नहीं है। अपीलीय अदालत ने उन पर 3,000 रुपए का हर्जाना भी लगाया था। इसके बाद प्रतिवादियों ने हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने दलील दी कि मुकद्दमे के दौरान दोनों पक्षों में एक नया समझौता हुआ था, जिसमें वादी को अतिक्रमणकारी पाया गया था, इसलिए प्रतिवादियों को जमीन का कब्जा वापस मिलना चाहिए था।

कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि प्रतिवादियों ने निचली अदालत में कोई जवाबी दावा दायर नहीं किया था, इसलिए उन्हें इस मुकद्दमे में सीधे कब्जा नहीं दिलाया जा सकता था। अदालत ने माना कि निचली अदालतों के फैसलों में साक्ष्यों को समझने में कोई गलती नहीं हुई है। हाईकोर्ट ने न केवल प्रतिवादियों की अपील को खारिज किया, बल्कि अदालत का समय खराब करने के लिए उन पर 10,000 रुपए का हर्जाना भी लगाया।


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Content Writer

Kuldeep

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