अन्न-जल त्याग 9 दिन तक छाती पर उगाए जौ...सिरमौर के मौनी बाबा की अनोखी तपस्या बनी आकर्षण का केंद्र
punjabkesari.in Friday, Mar 27, 2026 - 05:57 PM (IST)
नाहन (आशु): जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र की सालवाला पंचायत में पांवटा साहिब से करीब 15 किलोमीटर दूर गिरि नदी के किनारे स्थित प्राचीन महाकालेश्वर मंदिर में एक मौनधारी बाबा पिछले नौ दिनों से अपनी छाती पर जौ उगाकर कठिन हठयोग और तपस्या में लीन रहे। नवरात्र के दौरान उनकी यह साधना क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी रही। इस दौरान उन्होंने अन्न ग्रहण नहीं किया और केवल होंठ भिगोने भर के लिए पानी की बूंदों पर साधना जारी रखी।
मौनी बाबा पिछले करीब दो वर्षों से मौन व्रत का पालन कर रहे हैं और अपनी बात लिखकर व्यक्त करते हैं। वे फलाहार व्रत में रहते हुए दिन में एक बार ही फलाहार ग्रहण करते हैं। नवरात्र के दौरान वे लगातार एक ही अवस्था में लेटे रहे, ताकि छाती पर बोए गए जौ सुरक्षित रूप से उग सकें। शुक्रवार को नवरात्रि समापन के पावन अवसर पर बाबा ने फलाहार ग्रहण कर अपना व्रत खोला। उन्होंने बताया कि उनका मौन व्रत करीब सवा दो साल का है, जो जून माह में पूर्ण होगा। उनका कहना है कि यह हठयोग धर्म की रक्षा के उद्देश्य से किया जा रहा है। अपनी डायरी में उन्होंने लिखा है कि आज के समय में लोग सुनना कम पसंद करते हैं, ऐसे में मौन सबसे बड़ी साधना है, जिससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, बाबा पूर्व में भी कठिन साधनाएं कर चुके हैं। वे एक साधारण कुटिया में निवास करते हैं और अधिकतर समय साधना में ही व्यतीत करते हैं। मौनी बाबा की यह अनोखी तपस्या इन दिनों क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर बाबा के दर्शन कर रहे हैं। कोई इसे आस्था का प्रतीक मान रहा है तो कोई इसे कठोर तप की मिसाल बता रहा है।
बिना अभ्यास न करें ऐसे प्रयोग : डॉ. प्रमोद पारीक
पांवटा साहिब आयुष अस्पताल में तैनात वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सक एवं योग विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद पारीक का कहना है कि हठयोग और मौन व्रत जैसी साधनाएं निरंतर अभ्यास और अनुशासन से ही संभव होती हैं। उन्होंने बताया कि मौन व्रत ऊर्जा संरक्षण में सहायक होता है, लेकिन लंबे समय तक भोजन और पानी का त्याग शरीर पर विपरीत असर डाल सकता है। साथ ही, लगातार एक ही स्थिति में रहने से शरीर को गंभीर नुक्सान हो सकता है।

