हिमाचल में भेड़पालकों का होगा ऑनलाइन पंजीकरण, नए सिरे से जारी होंगे चराई परमिट
punjabkesari.in Monday, Jul 06, 2026 - 03:58 PM (IST)
शिमला (भूपिन्द्र): हिमाचल प्रदेश में भेड़ एवं बकरी पालन से जुड़े लोगों के लिए अब पंजीकरण और चराई परमिट की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन की जाएगी। नई ग्रेजिंग पॉलिसी के तहत सभी भेड़पालकों का नए सिरे से पंजीकरण किया जाएगा और इसके बाद उन्हें नए चराई परमिट जारी किए जाएंगे। इस पूरी व्यवस्था के लिए संबंधित वन मंडल अधिकारी (डीएफओ) को नोडल अधिकारी बनाया जाएगा। नई व्यवस्था के तहत पशुपालन विभाग और वन विभाग संयुक्त रूप से एक ऑनलाइन पोर्टल विकसित करेंगे। इस पोर्टल पर प्रदेश के सभी भेड़पालकों का डिजिटल डाटा उपलब्ध रहेगा। इसमें भेड़पालकों की संख्या, उनके पास मौजूद पशुधन, चराई के पारंपरिक मार्ग, डैरे (विश्राम स्थल), जल स्रोत और चराई स्थलों का पूरा विवरण दर्ज किया जाएगा। इससे पहली बार प्रदेश में भेड़पालकों और उनके पशुधन का समग्र एवं प्रमाणिक रिकॉर्ड तैयार होगा।
अब तक भेड़पालकों के संबंध में कोई एकीकृत डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। चराई की अनुमति मुख्य रूप से प्रशासनिक आदेशों और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर जारी की जाती रही है। कई मामलों में वर्षों पुराने रिकॉर्ड के आधार पर ही परमिट जारी होते रहे, जिससे वास्तविक स्थिति का आकलन करना कठिन था। नई ऑनलाइन व्यवस्था इस कमी को दूर करेगी और सभी जानकारियां एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगी। ग्रेजिंग पॉलिसी लागू होने के बाद अब सभी पात्र भेड़पालकों का नए सिरे से पंजीकरण किया जाएगा। इसके बाद ऑनलाइन माध्यम से ही चराई परमिट जारी किए जाएंगे। सरकार का उद्देश्य पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी, सरल और व्यवस्थित बनाना है, ताकि पात्र लोगों को समय पर अनुमति मिल सके और चराई क्षेत्रों का बेहतर प्रबंधन हो सके।
सरकार को मिलेगा भेड़पालकों और पशुधन का वास्तविक आंकड़ा, भविष्य की योजनाएं बनाने में होगी सहायक
इस पहल से सरकार को यह स्पष्ट जानकारी मिलेगी कि प्रदेश में कुल कितने भेड़पालक इस व्यवसाय से जुड़े हैं, कितने लोगों को चराई परमिट जारी किए गए हैं तथा विभिन्न क्षेत्रों में चराई का वास्तविक स्वरूप क्या है। साथ ही यह भी पता चल सकेगा कि प्रदेश में कुल पशुधन की संख्या कितनी है और किन क्षेत्रों में अधिक चराई होती है। भेड़पालकों का सटीक आंकड़ा उपलब्ध होने से भविष्य में उनके लिए कल्याणकारी योजनाएं, सहायता कार्यक्रम और अन्य नीतियां तैयार करने में सुविधा होगी। इसके अलावा चराई स्थलों, जल स्रोतों और डैरों का वैज्ञानिक प्रबंधन भी संभव हो सकेगा।

