''थोड़ी देर में आता हूँ'' कहकर गया था हरीश... जानें कोमा से इच्छामृत्यु तक की दर्दनाक दास्तां
punjabkesari.in Wednesday, Mar 18, 2026 - 04:42 PM (IST)
हिमाचल डेस्क। समय का चक्र कितना निष्ठुर हो सकता है, इसका जीवंत उदाहरण है हरीश राणा की कहानी। एक ऐसा युवक जिसने 13 साल पहले एक वादा किया था कि वह बस थोड़ी देर में लौटेगा, लेकिन किस्मत ने उसे एक ऐसी अंतहीन खामोशी की जंजीरों में जकड़ दिया कि उसका परिवार सर्वोच्च न्यायालय से उसे मौत की नींद सुलाने की गुहार लगाने को मजबूर हो गया।
वह आखिरी वादा और बदलती जिंदगी
बीते साल 2013 के रक्षाबंधन की है। खुशियों का माहौल था और भाई-बहन के अटूट प्रेम का पर्व मनाया जा रहा था। कांगड़ा के प्लेटा गांव के हरीश से जब उसके ममेरे भाई ने साथ चलने की ज़िद की, तो उसने मुस्कुराते हुए कहा था— "तुम निकलो, मैं थोड़ी देर बाद आता हूँ।" किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि ये शब्द हरीश के जीवन के आखिरी सार्थक शब्द बन जाएंगे। इसके कुछ ही समय बाद एक दुखद हादसे में वह चौथी मंजिल से गिर गया और तब से वह 'कोमा' की गहरी धुंध में ऐसा खोया कि आज तक वापस नहीं आ सका।
ममता की हार और संघर्ष की पराकाष्ठा
हरीश को वापस जिंदगी की पटरी पर लाने के लिए उसके माता-पिता, अशोक राणा और परिवार ने अपनी पूरी दुनिया दांव पर लगा दी। इलाज के खर्च ने न केवल उनकी जमापूंजी निगल ली, बल्कि उन्हें अपना दिल्ली वाला घर तक बेचना पड़ा। पिछले कई वर्षों से गाजियाबाद का उनका घर किसी अस्पताल के वार्ड में तब्दील हो चुका था, जहाँ मशीनें ही हरीश की सांसों का हिसाब रख रही थीं।
अपनों की यादें और गांव का सन्नाटा
भले ही परिवार काम के सिलसिले में हिमाचल से बाहर रहता था, लेकिन उनकी जड़ें हमेशा प्लेटा गांव से जुड़ी रहीं। ग्रामीणों को आज भी वह दौर याद है जब कोरोना काल के दौरान अशोक राणा ने गांव में नया घर बनाकर अपनों के बीच समय बिताया था।
पड़ोसी सुदेश कुमारी की आँखें आज भी उन दिनों को याद कर नम हो जाती हैं जब हरीश की खिलखिलाहट से पूरा मोहल्ला गूँजता था। हरीश के मामा मिलाप सिंह बताते हैं कि वह बच्चा उनके दिल के सबसे करीब था, लेकिन पीजीआई के उस वार्ड से शुरू हुआ संघर्ष आज इस मोड़ पर खड़ा है कि रूह कांप जाती है।
एक कठिन निर्णय की ओर
सरी पंचायत के उपप्रधान राजू राणा सहित पूरे क्षेत्र में इस समय शोक की लहर है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने की खबर ने सबको झकझोर कर रख दिया है। यह मामला सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि एक ऐसे पिता और परिवार की बेबसी की कहानी है जिसने अपने बच्चे को तिल-तिल मरते देखने के बजाय उसे सम्मानजनक विदाई देना बेहतर समझा।

