Himachal: यूरोप से हजारों किलोमीटर दूर किन्नौर पहुंचा ये खास मेहमान! कैमरे में पहली बार कैद हुई शानदार झलक
punjabkesari.in Friday, Aug 07, 2026 - 05:44 PM (IST)
शिमला (भूपिन्द्र): रक्छम-छितकुल वन्यजीव अभ्यारण्य से हिमाचल प्रदेश की जैव विविधता के लिए एक बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि सामने आई है। यूरोप और उत्तरी एशिया से हजारों किलोमीटर की यात्रा कर आने वाले प्रवासी जलपक्षी कॉमन ग्रीनशैंक को पहली बार किन्नौर जिले में देखा और कैमरे में रिकॉर्ड किया गया है। इसे प्रजाति का जिले से पहला प्रमाणित रिकॉर्ड माना जा रहा है, जिससे किन्नौर की पक्षी सूची में एक नई प्रजाति जुड़ गई है। यह पक्षी रक्छम क्षेत्र में नियमित फील्ड मॉनीटरिंग के दौरान ब्लॉक फोरैस्ट ऑफिसर संतोष कुमार ठाकुर ने दर्ज किया। इस दौरान उनके साथ गोपाल नेगी और अल्पना नेगी भी मौजूद थे।
ब्लॉक फोरैस्ट ऑफिसर संतोष कुमार ठाकुर ने बताया कि प्रवासी पक्षियों के ऐसे रिकॉर्ड उनके उड़ान मार्ग और व्यवहार को समझने में बेहद उपयोगी होते हैं। रक्छम-छितकुल क्षेत्र प्रवासी पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्टॉपओवर साइट के रूप में कार्य करता है, जहां वे लंबी यात्रा के दौरान विश्राम कर अपनी ऊर्जा पुनः प्राप्त करते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में इस प्रकार के रिकॉर्ड वैज्ञानिक अनुसंधान, संरक्षण योजनाओं और जैव विविधता की प्रभावी मॉनीटरिंग के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे। वन्यप्राणी विशेषज्ञ अंकुश ठाकुर ने बताया कि कॉमन ग्रीनशैंक एक प्रवासी जलपक्षी है, जो उत्तरी यूरोप और एशिया में प्रजनन करता है तथा सर्दियों के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में पहुंचता है।
यह प्रजाति सामान्यतः नदियों के किनारों, आर्द्रभूमियों और उथले जलाशयों में पाई जाती है। वन्यप्राणी विशेषज्ञ हिमांशु चौधरी ने बताया कि किन्नौर घाटी से कॉमन ग्रीनशैंक का यह पहला प्रलेखित रिकॉर्ड है। इससे पहले यह पक्षी स्पीति क्षेत्र तथा वर्ष 2024 में रांगरिक में दर्ज किया जा चुका है। यह नया रिकॉर्ड किन्नौर के पक्षी डाटाबेस को और समृद्ध करेगा तथा यह साबित करता है कि जिले की नदियां और आर्द्रभूमियां प्रवासी जलपक्षियों के लिए महत्वपूर्ण विश्राम स्थल हैं। हिमाचल प्रदेश की ई-बर्ड समन्वयक डॉ. माल्याश्री भट्टाचार्य ने भी पुष्टि की है कि ई-बर्ड प्लेटफॉर्म पर किन्नौर जिले से कॉमन ग्रीनशैंक का यह पहला रिकॉर्ड है। डीएफओ सांगला वन्यजीव मंडल अशोक नेगी ने इस खोज को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे किन्नौर की पहचान उच्च हिमालय में प्रवासी पक्षियों के प्रमुख माइग्रेशन कॉरिडोर के रूप में और मजबूत हुई है।
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