हिमाचल में बढ़ रहा तबाही का डर! ये 9 ग्लेशियर झीलें हुईं संवेदनशील, IIT मंडी की स्टडी में खुलासा

punjabkesari.in Saturday, Sep 05, 2026 - 06:05 PM (IST)

Shimla News : नेपाल में अचानक आई बाढ़ से हुई भारी तबाही और जान-माल के नुकसान ने हिमाचल प्रदेश के लिए संभावित खतरे को उजागर कर दिया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के शोधकर्ताओं ने राज्य में तेजी से बढ़ रही नौ हिमनद झीलों की पहचान की है। शोधकर्ताओं ने इन झीलों को संभावित 'जल बम' बताया है, जिनके फटने से बड़े पैमाने पर तबाही हो सकती है।

झीलों का खतरा और बढ़ रहा

आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने कहा कि ये झीलें निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। बढ़ते तापमान के कारण पूरे हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे इन झीलों का खतरा और बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं ने उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों और अन्य आंकड़ों के विश्लेषण में पाया कि पिछले एक दशक में हिमालयी क्षेत्र में हिमनद झीलों की संख्या करीब 30 प्रतिशत बढ़ गई है। इनके आकार में भी काफी विस्तार हुआ है। छह सदस्यीय शोध दल का नेतृत्व करने वाले आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के संस्थापक अध्यक्ष प्रोफेसर डेरिक्स पी. शुक्ला ने कहा कि इससे अचानक हिमनद झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ की आशंका बढ़ गई है। ऐसी बाढ़ में भारी मात्रा में पानी और मलबा अचानक निचले इलाकों की ओर बह सकता है। अध्ययन में चंबा और लाहौल-स्पीति के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थित नौ झीलों-कालीकुंड, चंद्रताल, वासुकी, सुराई, क्या त्सो, योचे, समुद्र टापू, कासांग और गेफांग गाथ—को विशेष रूप से संवेदनशील पाया गया है।

'संख्या 2015 में दर्ज झीलों से करीब 710 अधिक'

शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि इन झीलों को रोकने वाली प्राकृतिक बाधाएं टूट जाती हैं, तो ये 'पानी बम' की तरह तबाही मचा सकती हैं। भूस्खलन, भूकंप या अन्य भूगर्भीय हलचलों से अचानक झील का पानी बाहर निकलने की घटना हो सकती है, जिससे नीचे की घाटियों में व्यापक तबाही हो सकती है। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि इन झीलों के संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में 15 से अधिक पुल, कई आबादी वाले इलाके तथा शैक्षणिक और स्वास्थ्य संस्थान आते हैं। अध्ययन के अनुसार, 2025 में हिमाचल प्रदेश में 3,500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित 2,076 हिमनद झीलों का मानचित्रण किया गया। यह संख्या 2015 में दर्ज झीलों से करीब 710 अधिक है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि पिछले एक दशक में इन झीलों का कुल क्षेत्रफल 28.45 प्रतिशत बढ़ा है, जो राज्य में हिमनद झीलों के फटने से आने वाली अचानक बाढ़ के बढ़ते खतरे को रेखांकित करता है। सबसे अहम बदलावों में से एक यह है कि ग्लेशियर पिघलने की वजह से लाहौल-स्पीति जिले में गेपांग गाथ झील का दायरा लगभग 2,44,000 वर्ग मीटर बढ़ गया। किन्नौर में कसांग झील का आकार लगभग 1,50,000 वर्ग मीटर बढ़ा, जबकि कांगड़ा और चंबा जिलों में कालिकुंड झील का दायरा लगभग 1,20,000 वर्ग मीटर बढ़ गया।

शोधकर्ताओं ने दी चेतावनी

शोधकर्ताओं ने कालिकुंड को खास तौर पर संवेदनशील माना है क्योंकि इसके चारों ओर खड़ी ढलानें हैं, जिससे अचानक झील के टूटने या फटने का खतरा बढ़ सकता है। अध्ययन में ग्लेशियर के पिघलने की गति बढ़ाने में इंसानी गतिविधियों को भी एक संभावित वजह बताया गया है। साथ ही यह चेतावनी भी दी गई है कि संवेदनशील हिमालयी इलाकों में पर्यटकों की बढ़ती गतिविधियों से ग्लेशियरों पर धूल जमा हो सकती है, यह धूल साफ बर्फ और हिम की तुलना में सूर्य की रोशनी अधिक सोखती है जिससे बर्फ पिघलने की दर बढ़ जाती है। भूकंप और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं हिमनद झीलों को और अस्थिर कर सकती हैं, जिससे अचानक बाढ़ आ सकती है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण समेत कई सरकारी एजेंसियां अभी हिमाचल प्रदेश की चार हिमनद झीलों को संवेदनशील मानती हैं जिनमें से तीन झीलें आईआईटी-मंडी के अध्ययन में भी शामिल हैं। उपग्रह प्रौद्योगिकी ने तेजी से बदल रही इन झीलों पर नजर रखना आसान बना दिया है, लेकिन शोधकर्ताओं ने जोर देकर कहा है कि जमीनी स्तर पर निगरानी, ​​शुरुआती चेतावनी प्रणालियों और सरकार के सख्त दखल की तत्काल जरूरत है। 

प्रदेश से जुड़ी खबरें पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp group को Join करें  
 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Editor

Swati Sharma

Related News