हिमाचल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, दूसरे राज्य की तर्ज पर ''वेतन समानता'' को अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता लागू

punjabkesari.in Thursday, Mar 26, 2026 - 06:34 PM (IST)

Shimla News : हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सरकारी कर्मचारियों के बीच वेतन समानता के दावों पर असर डालने वाले अहम फैसले में राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (एसएटी) के 2018 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें हिमाचल सरकार को सहकारिता विभाग के निरीक्षकों को पंजाब की तर्ज पर संशोधित वेतनमान देने का निर्देश दिया गया था। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह सांघीवालिया और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर रिट याचिकाओं के एक समूह को स्वीकार करते हुए न्यायाधिकरण के 13 अप्रैल 2018 के साझा आदेश को दरकिनार कर दिया है।

'अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया'

यह विवाद सहकारिता विभाग में कार्यरत निरीक्षकों के दावों से पैदा हुआ था। उन्होंने एक जनवरी 1986 से 1800-3200 रुपये के उच्च वेतनमान की मांग की थी। उनकी मांग पंजाब में समान पदों के साथ समानता पर आधारित थी, जहां पंजाब वेतन आयोग की सिफारिशों और बाद के न्यायिक निर्णयों के बाद ऐसे संशोधित वेतनमान दिए गए थे। इन दावों को स्वीकार करते हुए न्यायाधिकरण ने पहले राज्य सरकार को परिणामी लाभों के साथ संशोधित वेतनमान देने का निर्देश दिया था। न्यायाधिकरण का मानना था कि समानता से इनकार करने से विसंगति पैदा हुई है। इसने कुछ मामलों में वेतन और पेंशन लाभों के पुन: निर्धारण का भी आदेश दिया था। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने 25 मार्च 2026 को दिये विस्तृत और लंबे फैसले में न्यायाधिकरण के तर्क से असहमति जतायी। खंडपीठ ने माना कि न्यायाधिकरण ने राज्य को दूसरे राज्य में लागू वेतनमान अपनाने के लिए प्रभावी रूप से मजबूर कर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था दी कि एक राज्य के लिए दूसरे राज्य के वेतन ढांचे का पालन करने का कोई कानूनी या संवैधानिक दायित्व नहीं है, जब तक कि ऐसे नियमों को स्पष्ट रूप से अपनाया न गया हो। अदालत ने अवलोकन किया कि सेवा शर्तें, भर्ती नियम, जॉब प्रोफाइल और वित्तीय विचार हर राज्य में अलग-अलग होते हैं और इनका स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

अदालत ने टिप्पणी की, 'हिमाचल प्रदेश राज्य को केवल इसलिए वेतन संशोधन लागू करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, क्योंकि किसी अन्य राज्य ने ऐसा किया है।' अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह के निर्देश वैधानिक प्राधिकरण के तहत बनाये गये सेवा नियमों और वेतन ढांचे को फिर से लिखने जैसा होगा। खंडपीठ ने आगे बताया कि न्यायाधिकरण ने मुख्य रूप से पदनाम की समानता पर भरोसा किया था, जबकि कैडर संरचना, योग्यता, कर्तव्यों और शासी सेवा नियमों जैसे महत्वपूर्ण कारकों की अनदेखी की थी। अदालत ने माना कि इस कारण न्यायाधिकरण के निष्कर्ष कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं रह गये। राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण का आदेश रद्द करते हुए उच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत की पुष्टि की है कि राज्यों के बीच वेतन समानता के दावों को अधिकार रूप में लागू नहीं किया जा सकता है। इस फैसले का उन समान सेवा संबंधी विवादों पर भी व्यापक असर पड़ेगा, जहां कर्मचारी अन्य राज्यों में प्रचलित वेतन ढांचे के आधार पर लाभ मांगते हैं। तदनुसार, राज्य द्वारा दायर याचिकाओं को स्वीकार कर लिया गया और कर्मचारियों को संशोधित वेतनमान प्रदान करने वाले न्यायाधिकरण द्वारा जारी सभी निर्देशों को दरकिनार कर दिया गया। 


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Content Editor

Swati Sharma

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