2 युवाओं के जुनून ने बदली गांव की तकदीर, अब भारी बर्फबारी ही बनी सेथन की सबसे बड़ी पहचान; पर्यटकों का लगा तांता
punjabkesari.in Sunday, Feb 08, 2026 - 01:48 PM (IST)
कुल्लू (संजीव जैन): पर्यटन नगरी मनाली के पास बसी सेथन घाटी अब सर्दियों में पर्यटन का नया केंद्र बन चुकी है। मनाली से महज 14 किलोमीटर दूर बसा सफेद चादर ओढ़कर एक छोटा सा गांव 'सेथन' कभी गुमनाम रहा, लेकिन आज यह गांव देश-दुनिया के पर्यटकों के लिए 'इग्लू विलेज' के नाम से मशहूर हो चुका है। इस बदलाव के पीछे किसी सरकारी योजना का हाथ नहीं, बल्कि गांव के 2 युवाओं ताशी और विकास की दूरगामी सोच और कुछ नया कर गुजरने का जज्बा है।
वर्ष 2016 से पहले तक सेथन गांव केवल चरवाहा बस्ती के रूप में जाना जाता था। सर्दियों में जब यहां भारी बर्फबारी होती थी तो गांव का संपर्क बाकी दुनिया से कट जाता था। इसी दौरान स्थानीय युवाओं ताशी व विकास ने सोचा कि क्यों न इस भारी बर्फबारी को ही गांव की ताकत बनाया जाए। उन्होंने फिनलैंड और अलास्का जैसे देशों की तर्ज पर बर्फ के घर यानी 'इग्लू' बनाने का निर्णय लिया। बिना किसी औपचारिक ट्रेनिंग के शुरूआत आसान नहीं थी। उन्होंने बर्फ के ब्लॉक काटकर अपना पहला इग्लू तैयार किया। स्थानीय लोगों को भी पहले यह एक पागलपन लगा, लेकिन जब पर्यटकों ने इस बर्फ के घर में रात बिताने में दिलचस्पी दिखाई तो गांव की तकदीर बदलने लगी। आज उन्हीं की मेहनत का नतीजा है कि सेथन अब देश का सबसे बड़ा इग्लू हब बन चुका है। समुद्र तल से करीब 2,700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सेथन गांव में पहुंचने वाले पर्यटक न केवल इग्लू को देखते हैं, बल्कि उनमें रात बिताने का लुत्फ भी उठाते हैं। एक इग्लू को बनाने में करीब 4 से 5 दिन का समय लगता है और इसमें केवल साफ बर्फ का उपयोग किया जाता है। एक पर्यटक के लिए बर्फ के घर के अंदर सोना किसी रोमांच से कम नहीं होता।
लोकल अर्थव्यवस्था को मिला सहारा
इग्लू विलेज के मशहूर होने से युवाओं के लिए रोजगार के रास्ते खुले हैं। जो गांव कभी सर्दियों में वीरान हो जाता था, वहां अब होम-स्टे, गाइड, टैक्सी चालक और स्कीइंग ट्रेनर्स की भारी मांग रहती है। ताशी व विकास ने इस स्टार्टअप से न केवल खुद को सफल बनाया, बल्कि 15 युवाओं को रोजगार भी दिया है। वे एक सीजन में 25 से 30 लाख रुपए की आय कमा रहे हैं।
बर्फबारी में विलंब, देरी से निर्माण
विकास ने बताया कि इस वर्ष बर्फबारी देर से होने के कारण इग्लू निर्माण में विलंब हुआ, जिससे कई बुकिंग्स कैंसिल करनी पड़ीं, फिर भी मांग इतनी ज्यादा है कि सीजन शुरू होते ही बुकिंग्स फुल हो जाती हैं। एक बार यहां आने वाले पर्यटक इस अनुभव से इतने प्रभावित होते हैं कि वे अपने दोस्तों-रिश्तेदारों को भी यहां आने के लिए प्रेरित करते हैं। इग्लू पर्यटन पूरी तरह पर मौसम पर निर्भर करता है। आमतौर पर यह दिसम्बर के अंत से मार्च के मध्य तक ही चलता है। जैसे-जैसे बर्फ पिघलती है, ये इग्लू भी प्रकृति में विलीन हो जाते हैं। विकास का कहना है कि वे हर वर्ष कुछ नया करने की कोशिश करते हैं ताकि पर्यटकों को हर बार अलग अनुभव मिले।
बर्फीली दुनिया का अहसास
विकास व ताशी बताते हैं कि इग्लू की बनावट ऐसी होती है कि बाहर भले ही बर्फीली हवाएं चल रही हों, लेकिन अंदर का तापमान बाहर की तुलना में काफी अधिक रहता है। रात में स्लीपिंग बैग और स्थानीय खानपान के साथ यह अनुभव सैलानियों को बर्फीली दुनिया का अहसास कराता है। विकास ने बताया कि पर्यटक ऑनलाइन माध्यमों से आसानी से बुकिंग कर सकते हैं। मनाली इग्लू स्टे के आधिकारिक सोशल मीडिया पेज, वैबसाइट या विभिन्न ट्रैवल प्लेटफॉर्म्स के जरिए रिजर्वेशन किया जा सकता है। ठंड से बचाव के लिए पैकेज में विशेष कपड़े भी दिए जाते हैं। इनमें बर्फ के जूते, थर्मल जैकेट, पैंट और अन्य सामान शामिल है।
बाहर के कम तापमान में भी इग्लू रहता है गर्म
विकास बताते हैं कि सेथन घाटी में सर्दियों में बर्फबारी के बाद बाहर का तापमान माइनस 15 से 20 डिग्री तक चला जाता है, लेकिन फिर भी यहां इग्लू के अंदर पर्यटक आराम से सो सकते हैं। उन्होंने बताया कि इग्लू का निर्माण करने से अंदर का तापमान सिर्फ माइनस 1 या 2 डिग्री तक ही रहता है। ऐसे में यहां इग्लू के अंदर पर्यटकों को सोने के लिए ऊनी बिस्तर और माइनस -20 डिग्री में काम आने वाले स्लीपिंग बैग्स रखे गए हैं। जिससे आसानी से पर्यटक इग्लू में रुकने का आनंद ले सकें।

