Watch Video: अनूठी परंपरा, 'यहां' चावल के दाने बता रहे भविष्य

मंडी (नीरज शर्मा): हिमाचल प्रदेश की देव परंपरा विश्व भर में अनूठी है। यहां बसने वाले देवी-देवताओं के प्रति लोगों की अटूट आस्था और श्रद्धा है। लोग अपने अराध्य देवी-देवताओं से मन्नतें मांगते हैं और उन्हें पूरा होने पर अपनी श्रद्धानुसार भेंट देवता को अर्पित करते हैं। लेकिन लोग मन्नतें मांगते कैसे हैं और देवी-देवता भक्तों को कैसे बताते हैं कि उनके द्वारा मांगी गई मन्नत पूरी होगी भी या नहीं। अधिकतर लोगों को इसके बारे में पता भी है और अधिकतर को नहीं भी। चलिए आज हम आपको बताते हैं कि देवी-देवताओं से कैसे चावल के दानों के माध्यम से 'देववाणी' करवाई जाती है। भक्त अपने अराध्य देवी-देवता के पास नतमस्तक होते हैं और उपरांत इसके अपने मन में कोई भी मन्नत मांगते हैं। यह मन्नत अपनी सुख-स्मृद्धि, खुशहाली या अन्य किसी कार्य को लेकर होती है।


चावल के दाने बता रहे भविष्य
इसके बारे में देवता की राय पूछी जाती है और इसके लिए सहारा लिया जाता है चावल के दानों का। देवता का पुजारी तीन उंगलियों से चावल के कुछ दाने उठाकर श्रद्धालु की हथेली पर रखता है। अगर 3, 5, 7 या 9 दाने आएं तो समझिए देवता ने अपनी सहमति जता दी है और काम जरूर होगा। अगर 2, 4, 6 या 8 आएं तो समझा जाता है कि देवता अनुमति नहीं दे रहा है। चावल के दानों के साथ अगर फूल आ जाएं तो उनकी गणना नहीं की जाती। वहीं अगर पुजारियों द्वारा दिए जाने वाले इन दानों की बात करें तो इन्हें कभी भी गिनकर नहीं दिया जाता। पुजारी तीन उंगलियों से चावल के दाने उठाते हैं और श्रद्धालु की हथेली पर रख देते हैं।


देवरथ के माध्यम से भी होती है देववाणी
अब यह श्रद्धालु की किस्मत पर ही तय होता है कि उसके मन में चल रहे सवाल का देवता ने क्या जबाव दिया है। इसे एक तरह से देववाणी कहा जाता है। हालांकि चावल के दानों के स्थान पर किसी दूसरे सूखे अनाज का इस्तेमाल भी किया जाता है लेकिन अधिकतर देवी-देवता के पास चावल के दानों से ही देववाणी की जाती है। प्रसाद के रूप में भी इन्हीं चावल के दानों और फूलों को दिया जाता है। हालांकि देववाणी के अन्य तरीके भी हैं। इसमें देवरथ के माध्यम से भी देववाणी होती है और पुजारी भी विशेष अवसरों पर देववाणी करता है लेकिन ज्यादा प्रचलित तरीका चावल के दानों का ही है। देवता का मंदिर हो या देवता कहीं बाहर गया हो उसके पुजारी के पास चावल के दाने और फूल जरूर होंगे। क्योंकि इसे ही देववाणी का माध्यम और प्रसाद माना जाता है।



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